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मनोरंजन के नाम पर टीवी धारावाहिकों में जिस्मानी रिश्तों को परोसा जा रहा है


प्रतिस्पर्द्धा के साथ वर्तमान समय मनोरंजन का भी है, किसी समय मनोरंजन का समय निश्चित था। यही मनोरंजन अब चौबीस घंटे उपलब्ध है वह भी ऐसा कि आपकी हथेली पर हाज़िर है। पहले मनोरंजन सरकार के अहाते में परोसा जाता था धीरे धीरे यह निजी हाथों में चला गया। सेंसर बोर्ड होते हुए भी ऐसे प्लेटफार्म उपलब्ध हैं जहां, कुछ भी, कहीं भी खाया जा सकता है। इन दुकानों पर मानवीय सम्बन्धों की खुली किताबें पढ़ने को मिल रही हैं। इन किताबों में स्त्री और पुरुष के जिस्मानी रिश्तों का मनमाना खुलापन जीभर कर परोसा जा रहा है।

किसी ज़माने में मनोरंजक कार्यकर्मों से जुड़ी सामाजिक संवेदना व प्रतिबद्धता अब गुज़रे वक़्त की कहानियाँ हैं। मनोरंजन अब एक शुद्ध व्यवसाय है, पैसा व प्रसिद्धि के लिए महिलाएं भी पुरुषों के बराबर नहीं उनसे बढ़चढ कर हिस्सा ले रही हैं। वह प्रसिद्धि और धन अर्जन के लिए अपने शरीर और खूबसूरती को एक प्रॉडक्ट मानती हैं। जीवन के हर क्षेत्र में विकासजी की घुसपैठ के कारण अनेक चीज़ों का स्तर भी गिरा है। सिर्फ़ धन और प्रसिद्धि के लिए प्रयासरत मनोरंजन का स्तर, शक्ति हासिल करने की राजनीति की तरह रसातल में जा रहा है।

 

आज दर्शकों की रुचि टिकाए रखने और टीआरपी की होड़ में ज़्यादातर कहानियों में सीरियल्स के कई पुरुष चरित्र ठरकी दिखाए जा रहे हैं। जिन ऐतिहासिक कथाओं को हमने बचपन में प्रेरणा ग्रहण करने के लिए या उदाहरण के तौर पर पढ़ा है, फ़िल्म या सीरियल के रूप में देखा है आज उन्हें सिर्फ़ मनोरंजक बना कर पेश किया जा रहा है। कितने ही सीरियल्स में रोमांस के साथ कॉमेडी के भोंडे मसाले का तड़का लगा है। हजारों एपिसोड वाले हास्य सीरियल, ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’, में विवाहित नायक का दूसरी विवाहित स्त्री के प्रति रोमांटिक एंगल दिखाया गया है, नायक की पत्नी सीरियल से गायब है लेकिन हीरो का रोमांस जारी है। ‘तेनाली राम’ की कहानी ऐसी तो न थी, महाराजा तो कूटनीति व राजनीति के तहत विवाह करते रहे हैं लेकिन यहाँ तो उनके राजगुरु भी जहाँ सुंदर स्त्री पात्र देखा, लार टपकाते दिखाए जाते हैं, चाहे दरबार हो या बाज़ार। ‘जीजाजी छत पर’ हैं, में नायिका नायक को जीजाजी पुकारती है लेकिन उनका इश्क़ जारी है और कॉमेडी भी। इसी सीरियल में स्त्री पात्र आते रहते हैं जिनके साथ किसी न किसी का इश्क़ चिपक जाता है। नायिका का प्रौढ़ पिता भी सुंदर लड़की देखकर उससे नैन मटक्का कर रहा है। ‘भाबीजी घर पर हैं’, में एक दूसरे की पत्नी पर लार टपकाते हुए सालों हो गए हैं। ‘भाखड़वडी’ सीरियल में प्रौढ़ चरित्र के साथ युवा स्त्री का पुराना परिचय दिखाया गया। सभी पुरुष और स्त्री पात्र विवाहित हैं, यह हमारे समाज की असलियत है या प्रेरणा है मस्त जीवन के लिए।

मनोरंजन और रोमांस के नाम पर स्त्री के प्रति पुरुष का आकर्षण अब नए आयाम तय कर रहा है। पुरुष, स्त्री पात्र बनकर आनंद बाँट रहे हैं। कोई भी किसी पर भी लार टपकाने के लिए अधिकृत है, दर्शक बोर हो रहे हों तो मेकअप में डूबा, नया स्त्री पात्र टपक पड़ता है। चुड़ेलें भी सुंदरतम हैं। नई फ़िल्म, ‘दिल दे के देखो’ में अधेड़ पति को युवा लड़की से प्यार हो जाता है, वह उसे अपनी पत्नी व बच्चों से मिलाने लाता है। स्त्री पुरुष सम्बंधों को हम कहाँ लेकर आ गए। फ़िल्मों का सफल फ़ार्मुला पहले भी नारी चरित्र रहा है लेकिन तब वह कहानी में बदलाव का अहम हिस्सा होता था, लेकिन अब यह सब मज़ा देने के लिए दिखाया जा रहा है। क्या हमारा समाज इन प्रस्तुतियों को सिर्फ मनोरंजन समझ कर देख रहा है या जहां जहां तनरंजन के किस्से हैं, उनका कुअसर हो रहा है। यह माना गया है कि मानव मस्तिष्क पर देखने का सीधा असर होता है। यदि ऐसा है तो असर हो रहा होगा, अगर असर लिया जा रहा है तो भारत की उस पीढ़ी का क्या होने वाला है जो किशोरावस्था से आगे बढ़ रही है, लेकिन मनोरंजन की गोद में तो शैशवास्था भी है न ?